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श्लोक 2.1.19-21  |
अभिप्रायेण पार्थानां कृष्णस्य च महात्मन:।
पुण्येऽहनि महातेजा: कृतकौतुकमङ्गल:॥ १९॥
तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठान् पायसेन सहस्रश:।
धनं बहुविधं दत्त्वा तेभ्य एव च वीर्यवान्॥ २०॥
सर्वर्तुगुणसम्पन्नां दिव्यरूपां मनोरमाम्।
दशकिष्कुसहस्रां तां मापयामास सर्वत:॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| उन्होंने कुन्तीपुत्रों और महात्मा श्रीकृष्ण की रुचि के अनुसार एक सभाभवन बनाने का निश्चय किया। किसी पवित्र तिथि (शुभ समय) में शुभ अनुष्ठान, स्वस्तिवाचन आदि करके महाबली मय ने हजारों श्रेष्ठ ब्राह्मणों को खीर खिलाकर तृप्त किया और उन्हें अनेक प्रकार के धन का दान दिया। इसके बाद उन्होंने सभाभवन बनाने के लिए चारों ओर से नापी हुई दस हजार हाथ (अर्थात् दस हजार हाथ चौड़ी और दस हजार हाथ लम्बी) दिव्य स्वरूप वाली और समस्त ऋतुओं के गुणों से युक्त पृथ्वी प्राप्त की। 19-21॥ |
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| He decided to build an assembly hall as per the interest of Kuntiputras and Mahatma Shri Krishna. On some sacred date (auspicious time), by performing auspicious rituals, reciting Swastiva, etc., the great and mighty Mayan satisfied thousands of great Brahmins by feeding them kheer and donated many types of money to them. After this, he got ten thousand hands (i.e. ten thousand hands wide and ten thousand hands long) of earth measured from all sides, having a divine appearance and having the qualities of all the seasons, to build the meeting hall. 19-21॥ |
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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभास्थाननिर्णये प्रथमोऽध्याय:॥ १॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभास्थाननिर्णयविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं) |
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