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श्लोक 18.6.95  |
एतत् पवित्रं परममेतद् धर्मनिदर्शनम्।
एतत् सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता॥ ९५॥ |
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| अनुवाद |
| यह महाभारत अत्यंत पवित्र है। यह धर्म के स्वरूप का अनुभव कराने वाला और समस्त सद्गुणों से युक्त है। अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्य को इसका श्रवण अवश्य करना चाहिए॥ 95॥ |
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| This Mahabharata is extremely sacred. It gives the experience of the nature of religion and is full of all the good qualities. A person who seeks his welfare must listen to it.॥ 95॥ |
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