| श्री महाभारत » पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व » अध्याय 6: » श्लोक 85 |
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| | | | श्लोक 18.6.85  | वाचके परितुष्टे तु शुभा प्रीतिरनुत्तमा।
ब्राह्मणेषु तु तुष्टेषु प्रसन्ना: सर्वदेवता:॥ ८५॥ | | | | | | अनुवाद | | कथावाचक के संतुष्ट होने पर ही उत्तम एवं मंगलमय प्रेम की प्राप्ति होती है। जब ब्राह्मण संतुष्ट हो जाते हैं, तो सभी देवता श्रोताओं पर प्रसन्न हो जाते हैं। 85. | | | | Only when the narrator is satisfied can one receive the most excellent and auspicious love. When the Brahmins are satisfied, all the gods are pleased with the listeners. 85. | | ✨ ai-generated | | |
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