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mahabharat 18.6.30-31: चौथे पारण में वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है और पाँचवें पारण में दुगुना फल प्राप्त होता है। वह मनुष्य उगते हुए सूर्य और प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी विमान पर सवार होकर देवताओं के साथ स्वर्ग को जाता है और वहाँ दस हजार वर्षों तक इन्द्र भवन में सुख भोगता है।   |   mahabharat अध्याय 18.6:   ।   mahabharat पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 6:  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  18.6.30-31 
चतुर्थे वाजपेयस्य पञ्चमे द्विगुणं फलम्।
उदितादित्यसंकाशं ज्वलन्तमनलोपमम्॥ ३०॥
विमानं विबुधै: सार्धमारुह्य दिवि गच्छति।
वर्षायुतानि भवने शक्रस्य दिवि मोदते॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
चौथे पारण में वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है और पाँचवें पारण में दुगुना फल प्राप्त होता है। वह मनुष्य उगते हुए सूर्य और प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी विमान पर सवार होकर देवताओं के साथ स्वर्ग को जाता है और वहाँ दस हजार वर्षों तक इन्द्र भवन में सुख भोगता है।
 
In the fourth Parana, the fruit of the Vajpeya Yajna is obtained and in the fifth, twice the fruit is obtained. That man, riding on a plane as radiant as the rising sun and the blazing fire, goes to heaven with the gods and there he enjoys bliss in Indra Bhawan for ten thousand years.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)