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mahabharat 18.6.25-26: जो मनुष्य प्रथम पारण के समय ब्राह्मणों को इच्छित वस्तुएँ देकर उन्हें संतुष्ट करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञ का फल पाता है। उसे अप्सराओं से युक्त विमान प्राप्त होता है और वह प्रसन्न एवं एकाग्र मन से देवताओं के साथ स्वर्ग को जाता है।॥25-26॥   |   mahabharat अध्याय 18.6:   ।   mahabharat पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 6:  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  18.6.25-26 
पारणं प्रथमं प्राप्य द्विजान् कामैश्च तर्पयन्।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं वै लभते नर:॥ २५॥
अप्सरोगणसंकीर्णं विमानं लभते महत्।
प्रहृष्ट: स तु देवैश्च दिवं याति समाहित:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य प्रथम पारण के समय ब्राह्मणों को इच्छित वस्तुएँ देकर उन्हें संतुष्ट करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञ का फल पाता है। उसे अप्सराओं से युक्त विमान प्राप्त होता है और वह प्रसन्न एवं एकाग्र मन से देवताओं के साथ स्वर्ग को जाता है।॥25-26॥
 
The person who satisfies the Brahmins by giving them the desired things at the time of the first Paran, gets the fruits of Agnishtom Yajna. He gets a plane filled with Apsaras and with a happy and concentrated mind he goes to heaven with the gods.॥ 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)