श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 6:  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  18.6.100 
स्वर्णशृङ्गीं च कपिलां सवत्सां वस्त्रसंवृताम्।
वाचकाय च दद्याद्धि आत्मन: श्रेय इच्छता॥ १००॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसे कपिला गाय के सींगों को सोने से मढ़कर, उसे वस्त्र से ढककर, बछड़े सहित उसे पाठक को दान कर देना चाहिए ॥100॥
 
A man who seeks his own welfare should plate the horns of a Kapila cow with gold, cover it with a cloth and then donate it along with the calf to the reader. ॥100॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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