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mahabharat 18.6.1-2: जनमेजय ने पूछा - हे प्रभु ! विद्वानों को महाभारत का श्रवण किस प्रकार करना चाहिए ? इसके श्रवण से क्या फल मिलता है ? इसके पारण के समय किन देवताओं का पूजन करना चाहिए ? हे प्रभु ! प्रत्येक उत्सव के अंत में क्या दान करना चाहिए ? तथा इस कथा का वाचक कैसा होना चाहिए ? कृपया मुझे यह सब बताइए । 1-2॥   |   mahabharat अध्याय 18.6:   ।   mahabharat पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 6:  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  18.6.1-2 
जनमेजय उवाच
भगवन् केन विधिना श्रोतव्यं भारतं बुधै:।
फलं किं के च देवाश्च पूज्या वै पारणेष्विह॥ १॥
देयं समाप्ते भगवन् किं च पर्वणि पर्वणि।
वाचक: कीदृशश्चात्र एष्टव्यस्तद् वदस्व मे॥ २॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा - हे प्रभु ! विद्वानों को महाभारत का श्रवण किस प्रकार करना चाहिए ? इसके श्रवण से क्या फल मिलता है ? इसके पारण के समय किन देवताओं का पूजन करना चाहिए ? हे प्रभु ! प्रत्येक उत्सव के अंत में क्या दान करना चाहिए ? तथा इस कथा का वाचक कैसा होना चाहिए ? कृपया मुझे यह सब बताइए । 1-2॥
 
Janamejaya asked – Lord! In what manner should scholars listen to Mahabharata? What is the result of listening to this? Which gods should be worshiped at the time of its Parana? Lord! What should be donated at the end of every festival? And what should the narrator of this story be like? Please tell me all this. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)