श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  18.5.8 
वैशम्पायन उवाच
न शक्यं कर्मणामन्ते सर्वेण मनुजाधिप।
प्रकृतिं किं नु सम्यक्ते पृच्छैषा सम्प्रयोजिता॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन बोले, "हे राजन! अपने कर्मों के फलों का भोग करने के पश्चात् सभी लोग अपने मूल स्वभाव (मूल कारण) को प्राप्त नहीं होते; (केवल कुछ ही अपने कारण में लीन हो जाते हैं)। यदि आप पूछें कि क्या मेरा प्रश्न अप्रासंगिक है? तो इसका उत्तर यह है कि जिन्होंने मूल स्वभाव को प्राप्त नहीं किया है, उनके लिए आपका प्रश्न सर्वथा सत्य है॥8॥
 
Vaishampayana said, "O King! After the enjoyment of the fruits of their actions, not all people attain their original nature (root cause); (Only a few merge in their cause). If you ask, is my question irrelevant? Then the answer to this is that for those who have not attained the original nature, your question is absolutely correct. ॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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