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mahabharat 18.5.68: जो सौ गौओं के सींगों में सोना लगाकर उन्हें वेदान्ती और विद्वान ब्राह्मण को दान करता है तथा जो प्रतिदिन महाभारत की कथा सुनता है, उन दोनों को समान फल मिलता है ॥68॥   |   mahabharat अध्याय 18.5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  18.5.68 
यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति
विप्राय वेदविदुषे सुबहुश्रुताय।
पुण्यां च भारतकथां सततं शृणोति
तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
जो सौ गौओं के सींगों में सोना लगाकर उन्हें वेदान्ती और विद्वान ब्राह्मण को दान करता है तथा जो प्रतिदिन महाभारत की कथा सुनता है, उन दोनों को समान फल मिलता है ॥68॥
 
The one who gives gold to the horns of a hundred cows and donates them to a Vedantist and a learned Brahmin and the one who listens to the Mahabharata story every day, both of them get equal results. 68॥
 
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रॺां संहितायां वैयासिक्यां स्वर्गारोहणपर्वणि पञ्चमोेऽध्याय:॥ ५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत नामक व्यासनिर्मित शतसाहस्री संहिताके स्वर्गारोहणपर्वमें पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५॥

॥ स्वर्गारोहणपर्व सम्पूर्णम्॥ श्रीमहाभारतम् सम्पूर्णम्
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)