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mahabharat 18.5.67: जो वेदव्यासजी के मुख से निकले हुए इस अतुलनीय, पुण्यमय, पवित्र, पापनाशक और कल्याणकारी महाभारत को दूसरों से सुनता है, उसे पुष्कर तीर्थ के जल में डुबकी लगाने की क्या आवश्यकता है? 67॥   |   mahabharat अध्याय 18.5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  18.5.67 
द्वैपायनोष्ठपुटनि:सृतमप्रमेयं
पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च।
यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं
किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
जो वेदव्यासजी के मुख से निकले हुए इस अतुलनीय, पुण्यमय, पवित्र, पापनाशक और कल्याणकारी महाभारत को दूसरों से सुनता है, उसे पुष्कर तीर्थ के जल में डुबकी लगाने की क्या आवश्यकता है? 67॥
 
The one who listens to this incomparable, virtuous, sacred, sinful and beneficial Mahabharata coming from the mouth of Ved Vyasji from others, what is the need to take a dip in the waters of Pushkar Teerth? 67॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)