श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  18.5.65 
यथा समुद्रो भगवान‍् यथा हि हिमवान् गिरि:।
ख्यातावुभौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
जैसे विशाल समुद्र और हिमालय पर्वत दोनों ही रत्नों के भण्डार कहे गए हैं, वैसे ही महाभारत भी नाना प्रकार के रत्नों से युक्त तथा शिक्षाओं से युक्त भण्डार कहा गया है ॥ 65॥
 
Just as the mighty ocean and the Himalayan mountains are both said to be treasure troves of gems, so too is the Mahabharata said to be a storehouse of various kinds of gems full of teachings. ॥ 65॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas