श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  18.5.63 
न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्
धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो:।
नित्यो धर्म: सुखदु:खे त्वनित्ये
जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य:॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
कामना, भय, लोभ अथवा प्राण रक्षा के लिए भी धर्म का परित्याग न करें। धर्म नित्य है, सुख-दुःख नित्य हैं। इसी प्रकार आत्मा नित्य है और उसका बंधन भी नित्य है। 63॥
 
Do not abandon religion out of desire, fear, greed or even to save one's life. Religion is eternal and happiness and sorrow are eternal. Similarly, the soul is eternal and its bondage is eternal. 63॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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