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श्लोक 18.5.61  |
हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्॥ ६१॥ |
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| अनुवाद |
| ‘अज्ञानी मनुष्य को प्रतिदिन हजारों सुख के अवसर और सैकड़ों भय के अवसर प्राप्त होते हैं; किन्तु विद्वान् पुरुष के मन पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता ॥ 61॥ |
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| ‘An ignorant person gets thousands of opportunities of joy and hundreds of opportunities of fear every day; but they have no effect on the mind of a learned person.॥ 61॥ |
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