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श्लोक 18.5.59  |
भारताध्ययनात् पुण्यादपि पादमधीयत:।
श्रद्धया परया भक्त्या श्राव्यते चापि येन तु॥ ५९॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य महाभारत का एक भी अंश अत्यंत श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, उसे सम्पूर्ण महाभारत के अध्ययन का पुण्य प्राप्त होता है और उसके प्रभाव से वह परम सिद्धि प्राप्त करता है ॥59॥ |
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| He who listens to or narrates even a single part of the Mahabharata with utmost faith and devotion, gets the merit of studying the entire Mahabharata and by its influence he achieves the highest success. ॥ 59॥ |
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