श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य  »  श्लोक 57-58
 
 
श्लोक  18.5.57-58 
इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसम्मितम्।
व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रत:॥ ५७॥
स नर: सर्वकामांश्च कीर्तिं प्राप्येह शौनक।
गच्छेत् परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशय:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
शौनक जी! जो मनुष्य ब्राह्मणों का नेतृत्व करते हुए व्यास जी द्वारा लिखित इस गूढ़ अर्थ से परिपूर्ण और वेदों के समान पवित्र इतिहास को सुनता है, वह इस लोक में समस्त इच्छित सुखों और उत्तम यश को प्राप्त करके परमगति को प्राप्त होता है। इस विषय में मुझे किंचितमात्र भी संदेह नहीं है।।57-58।।
 
Shaunak ji! The person who listens to this sacred history written by Vyasa, which is full of deep meaning and is equal to the Vedas, leading the Brahmins, achieves the highest success by getting all the desired pleasures and excellent fame in this world. I do not have the slightest doubt in this matter. 57-58.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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