श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  18.5.54-55 
षष्टिं शतसहस्राणि चकारान्यां स संहिताम्।
त्रिंशच्छतसहस्राणि देवलोके प्रतिष्ठितम्॥ ५४॥
पित्र्ये पञ्चदशं ज्ञेयं यक्षलोके चतुर्दश।
एकं शतसहस्रं तु मानुषेषु प्रभाषितम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने सर्वप्रथम 60 लाख श्लोकों वाली महाभारत संहिता की रचना की थी। इनमें से 30 लाख श्लोकों वाली संहिता देवलोक में प्रचलित हुई। 15 लाख श्लोकों वाली दूसरी संहिता पितृलोक में प्रचलित हुई। 14 लाख श्लोकों वाली तीसरी संहिता यक्षलोक में प्रतिष्ठित हुई और 1 लाख श्लोकों वाली चौथी संहिता मनुष्यों में प्रचलित हुई।
 
He had first created the Mahabharata Samhita of 60 lakh verses. Of these, the Samhita of 30 lakh verses was popular in the Devlok. The second Samhita of 15 lakh verses was popular in the Pitrlok. The third Samhita of 14 lakh verses was respected in the Yakshalok and the fourth Samhita of 1 lakh verses was popular among humans. 54-55.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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