श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  18.5.46-47 
अष्टादशपुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वश:।
वेदा: साङ्गास्तथैकत्र भारतं चैकत: स्थितम्॥ ४६॥
श्रूयतां सिंहनादोऽयमृषेस्तस्य महात्मन:।
अष्टादशपुराणानां कर्तुर्वेदमहोदधे:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
अठारह पुराणों के रचयिता और वैदिक ज्ञान के सागर महर्षि व्यास की यह गर्जना सुनो। वे कहते हैं, 'अठारह पुराण, सम्पूर्ण धर्मशास्त्र और चारों वेद अपने-अपने छह भागों सहित एक ओर तथा दूसरी ओर केवल महाभारत, यह अकेला ही उन सबके बराबर है।'॥46-47॥
 
Listen to this roar of the great sage Vyasa, the creator of the eighteen Puranas and the ocean of Vedic knowledge. He says, 'Eighteen Puranas, the complete Dharmashastra and the four Vedas with their six parts on one side and the Mahabharata alone on the other side, this alone is equal to all of them.'॥ 46-47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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