श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  18.5.45 
भरतानां महज्जन्म तस्माद् भारतमुच्यते।
महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते।
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
यह ग्रंथ भरतवंश के महान जन्म-कर्मों का वर्णन करता है, इसीलिए इसे महाभारत कहा गया है। यह महान् और भारी होने के कारण भी इसे महाभारत कहा गया है। जो महाभारत की व्युत्पत्ति को जानता और समझता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ 45॥
 
This book describes the great birth deeds of the Bharata dynasty, hence it is called Mahabharata. It is also called Mahabharata because it is great and heavy. One who knows and understands the etymology of Mahabharata becomes free from all sins. ॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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