श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  18.5.43 
अह्ना यदेन: कुरुते इन्द्रियैर्मनसापि वा।
महाभारतमाख्याय पश्चात् संध्यां प्रमुच्यते॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य दिन में अपनी इन्द्रियों और मन से जो पाप करता है, वे सब सायंकाल में महाभारत का पाठ करने से क्षमा हो जाते हैं ॥ 43॥
 
All the sins that a man commits with his senses and mind during the day are forgiven by reciting the Mahabharata in the evening. ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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