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mahabharat 18.5.35: इस प्रकार मैंने वह सब कथा आपसे कही है, जो व्यासजी की आज्ञा से जनमेजय द्वारा किये गये सर्पयज्ञ के समय वैशम्पायन ऋषि ने कही थी और जो मैंने अपने पिता सूतजी से प्राप्त की थी।   |   mahabharat अध्याय 18.5: भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  18.5.35 
एतत् ते सर्वमाख्यातं वैशम्पायनकीर्तितम्।
व्यासाज्ञया समाज्ञातं सर्पसत्रे नृपस्य हि॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने वह सब कथा आपसे कही है, जो व्यासजी की आज्ञा से जनमेजय द्वारा किये गये सर्पयज्ञ के समय वैशम्पायन ऋषि ने कही थी और जो मैंने अपने पिता सूतजी से प्राप्त की थी।
 
In this manner, I have narrated to you all the story which the sage Vaishmpayana had narrated at the time of the snake sacrifice performed by Janamejaya by the order of Vyasa and which I had acquired from my father Suta.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)