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mahabharat 18.3.5-7h: कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिर ने वहाँ जितने विकृत शरीर देखे थे, वे सब लुप्त हो गए। तत्पश्चात वहाँ पवित्र, सुखदायक, शुद्ध सुगन्ध वाली वायु बहने लगी। भारत देवताओं के समीप बहने वाली वह वायु अत्यंत शीतल प्रतीत हो रही थी। 5-6 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 18.3: इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना   ।   mahabharat पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 3: इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना  »  श्लोक 5-7h
 
 
श्लोक  18.3.5-7h 
विकृतानि शरीराणि यानि तत्र समन्तत:॥ ५॥
ददर्श राजा कौरव्यस्तान्यदृश्यानि चाभवन्।
ततो वायु: सुखस्पर्श: पुण्यगन्धवह: शुचि:॥ ६॥
ववौ देवसमीपस्थ: शीतलोऽतीव भारत।
 
 
अनुवाद
कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिर ने वहाँ जितने विकृत शरीर देखे थे, वे सब लुप्त हो गए। तत्पश्चात वहाँ पवित्र, सुखदायक, शुद्ध सुगन्ध वाली वायु बहने लगी। भारत देवताओं के समीप बहने वाली वह वायु अत्यंत शीतल प्रतीत हो रही थी। 5-6 1/2॥
 
All the deformed bodies that Kurukulanandan King Yudhishthir had seen around there disappeared. Thereafter, a sacred, soothing wind carrying pure fragrance started blowing there. India That wind flowing near the gods seemed very cool. 5-6 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)