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mahabharat 18.3.43-44: तत्पश्चात् देवताओं से घिरे हुए बुद्धिमान कुरुराज युधिष्ठिर महर्षियों से अपनी स्तुति सुनकर धर्म के साथ उस स्थान पर गए जहाँ वीर पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र क्रोध त्यागकर अपने-अपने स्थान पर सुखपूर्वक रहते थे। 43-44॥   |   mahabharat अध्याय 18.3: इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना   ।   mahabharat पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 3: इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना  »  श्लोक 43-44
 
 
श्लोक  18.3.43-44 
ततो ययौ वृतो देवै: कुरुराजो युधिष्ठिर:।
धर्मेण सहितो धीमान् स्तूयमानो महर्षिभि:॥ ४३॥
यत्र ते पुरुषव्याघ्रा: शूरा विगतमन्यव:।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च स्वानि स्थानानि भेजिरे॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् देवताओं से घिरे हुए बुद्धिमान कुरुराज युधिष्ठिर महर्षियों से अपनी स्तुति सुनकर धर्म के साथ उस स्थान पर गए जहाँ वीर पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र क्रोध त्यागकर अपने-अपने स्थान पर सुखपूर्वक रहते थे। 43-44॥
 
Thereafter, surrounded by the gods, the wise Kuru king Yudhishthir, hearing his praise from the great sages, went with Dharma to the place where the brave Pandavas and the sons of Dhritarashtra, having given up their anger, lived happily at their respective places. 43-44॥
 
इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि युधिष्ठिरतनुत्यागे तृतीयोऽध्याय:॥ ३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्वर्गारोहणपर्वमें युधिष्ठिरका देहत्यागविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥ ३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)