vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व
»
अध्याय 2: देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना
»
श्लोक 53
श्लोक
18.2.53
इत्युक्त: स तदा दूत: पाण्डुपुत्रेण धीमता।
जगाम तत्र यत्रास्ते देवराज: शतक्रतु:॥ ५३॥
अनुवाद
बुद्धिमान पाण्डुपुत्र की यह बात सुनकर वह देवदूत उस स्थान पर गया जहाँ सौ यज्ञ करने वाले देवताओं के राजा इन्द्र विराजमान थे ॥53॥
Hearing this from the wise son of Pandu, the angel went to the place where Indra, the king of gods who performed hundred yagyas, was seated. 53॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas