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mahabharat 18.2.50: धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर के मन में बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ और वे देवताओं और धर्म को कोसने लगे।   |   mahabharat अध्याय 18.2: देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना   ।   mahabharat पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 2: देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  18.2.50 
क्रोधमाहारयच्चैव तीव्रं धर्मसुतो नृप:।
देवांश्च गर्हयामास धर्मं चैव युधिष्ठिर:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर के मन में बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ और वे देवताओं और धर्म को कोसने लगे।
 
A great rage arose in the mind of King Yudhishthira, the son of Dharma. He started cursing the gods and Dharma. 50.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)