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mahabharat 18.2.5: तथापि यदि उन राजाओं ने इस शुभ और अविनाशी लोक को प्राप्त नहीं किया है, तो मैं उनके जाति-बंधुओं के बिना यहाँ नहीं रहूँगा ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 18.2: देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना   ।   mahabharat पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 2: देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  18.2.5 
कच्चिन्न तैरवाप्तोऽयं नृपैर्लोकोऽक्षय: शुभ:।
न तैरहं विना रंस्ये भ्रातृभिर्ज्ञातिभिस्तथा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
तथापि यदि उन राजाओं ने इस शुभ और अविनाशी लोक को प्राप्त नहीं किया है, तो मैं उनके जाति-बंधुओं के बिना यहाँ नहीं रहूँगा ॥5॥
 
However, if those kings have not attained this auspicious and imperishable world, then I will not stay here without their brothers of the caste. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)