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श्लोक 18.2.48  |
किं नु सुप्तोऽस्मि जागर्मि चेतयामि न चेतये।
अहो चित्तविकारोऽयं स्याद् वा मे चित्तविभ्रम:॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| मैं सो रहा हूँ या जाग रहा हूँ? मैं सचेत हूँ या नहीं? अरे! क्या यह मेरे मन का विकार है? या यह मेरे मन का भ्रम है?॥48॥ |
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| ‘Am I asleep or awake? Am I conscious or not? Oh! Is this a disorder of my mind? Or it may be a delusion of my mind.’॥ 48॥ |
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