श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 2: देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  18.2.48 
किं नु सुप्तोऽस्मि जागर्मि चेतयामि न चेतये।
अहो चित्तविकारोऽयं स्याद् वा मे चित्तविभ्रम:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
मैं सो रहा हूँ या जाग रहा हूँ? मैं सचेत हूँ या नहीं? अरे! क्या यह मेरे मन का विकार है? या यह मेरे मन का भ्रम है?॥48॥
 
‘Am I asleep or awake? Am I conscious or not? Oh! Is this a disorder of my mind? Or it may be a delusion of my mind.’॥ 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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