श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 2: देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  18.2.14 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा तं ततो देवा देवदूतमुपादिशन्।
युधिष्ठिरस्य सुहृदो दर्शयेति परंतप॥ १४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - शत्रुओं को पीड़ा देने वाले जनमेजय! युधिष्ठिर से ऐसा कहकर देवताओं ने देवदूत को आदेश दिया - 'तुम युधिष्ठिर को उनके मित्रों का दर्शन कराओ।' ॥14॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya, the one who torments the enemies! Saying this to Yudhishthira, the gods ordered the angel - 'You should show Yudhishthira the sight of his friends'. 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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