श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 1: स्वर्गमें नारद और युधिष्ठिरकी बातचीत  »  श्लोक 7-9
 
 
श्लोक  18.1.7-9 
ब्रुवन्नुच्चैर्वचस्तान् वै नाहं दुर्योधनेन वै।
सहित: कामये लोकाँल्लुुब्धेनादीर्घदर्शिना॥ ७॥
यत्कृते पृथिवी सर्वा सुहृदो बान्धवास्तथा।
हतास्माभि: प्रसह्याजौ क्लिष्टै: पूर्वं महावने॥ ८॥
द्रौपदी च सभामध्ये पाञ्चाली धर्मचारिणी।
पर्याकृष्टानवद्याङ्गी पत्नी नो गुरुसंनिधौ॥ ९॥
 
 
अनुवाद
फिर वह उन सब से ऊँचे स्वर में बोला, 'हे देवताओं! जिसके कारण हमने युद्ध में अपने समस्त बन्धु-बान्धवों को हठपूर्वक मार डाला है और सम्पूर्ण पृथ्वी को उजाड़ दिया है, जिसने पहले हमें महान वन में महान् कष्ट पहुँचाया था और जिसने हमारी पतिव्रता पत्नी, निर्दोष शरीर वाली पांचाल राजकुमारी द्रौपदी को सभा में ज्येष्ठजनों के सामने घसीटकर ले गया था, उस लोभी और अदूरदर्शी दुर्योधन के साथ रहकर मैं इन पवित्र लोकों को प्राप्त नहीं करना चाहता।'
 
Then he spoke to all of them in a loud voice, 'O Gods! I do not wish to attain these holy worlds by staying with that greedy and short-sighted Duryodhana, because of whom we have stubbornly killed all our friends and relatives in the war and devastated the entire earth, who had earlier caused us great suffering in the great forest and who had dragged our pious wife, Panchala princess Draupadi, who had flawless body parts, in front of the elders in the assembly. 7-9.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)