धृष्टद्युम्नं सात्यकिं च धृष्टद्युम्नस्य चात्मजान्।
ये च शस्त्रैर्वधं प्राप्ता: क्षत्रधर्मेण पार्थिवा:॥ २४॥
क्व नु ते पार्थिवान् ब्रह्मन्नैतान् पश्यामि नारद।
विराटद्रुपदौ चैव धृष्टकेतुमुखांश्च तान्॥ २५॥
शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं द्रौपदेयांश्च सर्वश:।
अभिमन्युं च दुर्धर्षं द्रष्टुमिच्छामि नारद॥ २६॥
अनुवाद
'मैं धृष्टद्युम्न, सात्यकि तथा धृष्टद्युम्न के पुत्रों को भी देखना चाहता हूँ। हे ब्रह्मन्! हे नारद! वे राजा कहाँ हैं जो क्षत्रिय धर्म के अनुसार शस्त्रों से मारे गए हैं? मैं इन राजाओं को यहाँ नहीं देख रहा हूँ। मैं इन सभी राजाओं से मिलना चाहता हूँ। मैं विराट, द्रुपद, धृष्टकेतु, पांचाल राजकुमार शिखण्डी, द्रौपदी के सभी पुत्रों तथा महाबली अभिमन्यु को भी देखना चाहता हूँ।'॥24-26॥
‘I also want to see Dhrishtadyumna, Satyaki and the sons of Dhrishtadyumna. O Brahman! O Narada! Where are those kings who have been killed by weapons according to the Kshatriya Dharma? I do not see these kings here. I want to meet all these kings. I also want to see Virat, Drupada, Dhrishtaketu, the Panchala prince Shikhandi, all the sons of Draupadi and the fierce warrior Abhimanyu.'॥ 24-26॥
इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि स्वर्गे नारदयुधिष्ठिरसंवादे प्रथमोेऽध्याय:॥ १॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्वर्गारोहणपर्वमें स्वर्गमें नारद और युधिष्ठिरका संवादविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥