Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 17.3.9: युधिष्ठिर बोले, "हे सहस्र नेत्रों वाले देवराज! किसी भी आर्य के लिए ऐसा नीच कार्य करना अत्यन्त कठिन है। मुझे ऐसा धन कभी न मिले जिसके लिए मुझे अपने भक्तों का परित्याग करना पड़े।" | mahabharat अध्याय 17.3: युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना । mahabharat पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
युधिष्ठिर उवाच
अनार्यमार्येण सहस्रनेत्र
शक्यं कर्तुं दुष्करमेतदार्य।
मा मे श्रिया सङ्गमनं तयास्तु
यस्या: कृते भक्तजनं त्यजेयम्॥ ९॥
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "हे सहस्र नेत्रों वाले देवराज! किसी भी आर्य के लिए ऐसा नीच कार्य करना अत्यन्त कठिन है। मुझे ऐसा धन कभी न मिले जिसके लिए मुझे अपने भक्तों का परित्याग करना पड़े।"
Yudhishthira said, "O thousand-eyed Devraj! It is very difficult for any Aryan to do such a lowly job. May I never get such wealth for which I have to abandon my devotees."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥