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mahabharat 17.3.8: इन्द्र ने कहा, "हे राजन! तुम्हें अमरता, मेरा स्वरूप, सम्पूर्ण ऐश्वर्य और महान् बल प्राप्त हुआ है, साथ ही तुम्हें स्वर्गीय सुख भी प्राप्त हुए हैं; अतः इस कुत्ते को छोड़कर मेरे साथ चलो। इसमें कोई कठोरता नहीं है।"   |   mahabharat अध्याय 17.3: युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व  »  अध्याय 3: युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  17.3.8 
शक्र उवाच
अमर्त्यत्वं मत्समत्वं च राजन्
श्रियं कृत्स्नां महतीं चैव सिद्धिम्।
संप्राप्तोऽद्य स्वर्गसुखानि च त्वं
त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति॥ ८॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र ने कहा, "हे राजन! तुम्हें अमरता, मेरा स्वरूप, सम्पूर्ण ऐश्वर्य और महान् बल प्राप्त हुआ है, साथ ही तुम्हें स्वर्गीय सुख भी प्राप्त हुए हैं; अतः इस कुत्ते को छोड़कर मेरे साथ चलो। इसमें कोई कठोरता नहीं है।"
 
Indra said, "O King! You have got immortality, my likeness, complete wealth and a great power, along with that you have also got heavenly pleasures; hence leave this dog and come with me. There is no harshness in this."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)