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mahabharat 17.3.31: देवेश्वर! मेरे भाइयों को जो भी स्थान मिला है, अच्छा या बुरा, मैं भी उसे प्राप्त करना चाहता हूँ। मैं उसके अतिरिक्त किसी अन्य लोक में जाना नहीं चाहता।'   |   mahabharat अध्याय 17.3: युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व  »  अध्याय 3: युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  17.3.31 
शुभं वा यदि वा पापं भ्रातॄणां स्थानमद्य मे।
तदेव प्राप्तुमिच्छामि लोकानन्यान्न कामये॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
देवेश्वर! मेरे भाइयों को जो भी स्थान मिला है, अच्छा या बुरा, मैं भी उसे प्राप्त करना चाहता हूँ। मैं उसके अतिरिक्त किसी अन्य लोक में जाना नहीं चाहता।'
 
Deveshwar! Whatever place my brothers have got, good or bad, I also want to get that. I do not wish to go to any other world except that.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)