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mahabharat 17.3.14: वीर! तुमने अपने पुण्य कर्मों के फलस्वरूप अपने भाइयों और अपनी प्रिय पत्नी द्रौपदी का परित्याग करके स्वर्ग प्राप्त किया है। फिर तुम इस कुत्ते का परित्याग क्यों नहीं कर देते? सब कुछ त्यागकर भी तुम्हें इस कुत्ते से प्रेम कैसे हो गया?॥14॥   |   mahabharat अध्याय 17.3: युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व  »  अध्याय 3: युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  17.3.14 
त्यक्त्वा भ्रातॄन् दयितां चापि कृष्णां
प्राप्तो लोक: कर्मणा स्वेन वीर।
श्वानं चैनं न त्यजसे कथं नु
त्यागं कृत्स्नं चास्थितो मुह्यसेऽद्य॥ १४॥
 
 
अनुवाद
वीर! तुमने अपने पुण्य कर्मों के फलस्वरूप अपने भाइयों और अपनी प्रिय पत्नी द्रौपदी का परित्याग करके स्वर्ग प्राप्त किया है। फिर तुम इस कुत्ते का परित्याग क्यों नहीं कर देते? सब कुछ त्यागकर भी तुम्हें इस कुत्ते से प्रेम कैसे हो गया?॥14॥
 
Brave! You have attained heaven as a result of your pious deeds by abandoning your brothers and your beloved wife Draupadi. ​​Then why don't you abandon this dog? How did you fall in love with the dog after abandoning everything? ॥14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)