Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 17.3.12: जो डरा हुआ है, भक्त है, जो दुःखी होकर मेरे पास आता है और कहता है कि मेरा कोई सहारा नहीं है, जो दुर्बल है और अपनी रक्षा करने में असमर्थ है तथा अपने प्राण बचाना चाहता है, ऐसे मनुष्य को मैं नहीं छोड़ सकता, चाहे उसके प्राण ही क्यों न चले जाएँ; यह मेरा शाश्वत व्रत है ॥12॥ | mahabharat अध्याय 17.3: युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना । mahabharat पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जो डरा हुआ है, भक्त है, जो दुःखी होकर मेरे पास आता है और कहता है कि मेरा कोई सहारा नहीं है, जो दुर्बल है और अपनी रक्षा करने में असमर्थ है तथा अपने प्राण बचाना चाहता है, ऐसे मनुष्य को मैं नहीं छोड़ सकता, चाहे उसके प्राण ही क्यों न चले जाएँ; यह मेरा शाश्वत व्रत है ॥12॥
One who is scared, a devotee, who comes to me in a distressed state saying that he has no other support, who is weak and incapable of defending himself and wants to save his life, I cannot leave such a person even if he loses his life; this is my eternal vow. ॥12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥