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mahabharat 17.3.1: वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय! तत्पश्चात्, आकाश और पृथ्वी को सब ओर से गुंजायमान करते हुए, देवराज इन्द्र रथ लेकर युधिष्ठिर के पास आये और उनसे कहा, 'हे कुन्तीपुत्र! आप इस रथ पर सवार होइये।'   |   mahabharat अध्याय 17.3: युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व  »  अध्याय 3: युधिष्ठिरका इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  17.3.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: सन्नादयन् शक्रो दिवं भूमिं च सर्वश:।
रथेनोपययौ पार्थमारोहेत्यब्रवीच्च तम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय! तत्पश्चात्, आकाश और पृथ्वी को सब ओर से गुंजायमान करते हुए, देवराज इन्द्र रथ लेकर युधिष्ठिर के पास आये और उनसे कहा, 'हे कुन्तीपुत्र! आप इस रथ पर सवार होइये।'
 
Vaishmpayana says, 'O Janamejaya! Thereafter, making the sky and the earth resound from all sides, the king of gods Indra arrived with a chariot to Yudhishthira and said to him, 'O son of Kunti! You ride this chariot.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)