श्री महाभारत  »  पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व  »  अध्याय 2: मार्गमें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरद्वारा प्रत्येकके गिरनेका कारण बताया जाना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  17.2.16-17 
रूपेण मत्समो नास्ति कश्चिदित्यस्य दर्शनम्।
अधिकश्चाहमेवैक इत्यस्य मनसि स्थितम्॥ १६॥
नकुल: पतितस्तस्मादागच्छ त्वं वृकोदर।
यस्य यद् विहितं वीर सोऽवश्यं तदुपाश्नुते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
भीमसेन! नकुल का सदैव यही मत रहा है कि सुन्दरता में मेरे समान कोई नहीं है। उसके मन में सदैव यही विचार रहता था कि 'मैं ही सबसे सुन्दर हूँ।' इसीलिए नकुल नीचे गिर पड़ा है। तुम आओ। वीर! अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। 16-17।
 
Bhimsen! Nakul's view has always been that there is no one like me in beauty. This thought always remained in his mind that 'only I am the most beautiful.' That is why Nakul has fallen down. You come. Brave! One has to bear the consequences of his deeds. 16-17.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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