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mahabharat 17.1.45-46: इसके बाद वे पश्चिम दिशा की ओर चल पड़े। आगे जाकर उन्होंने द्वारकापुरी को समुद्र में डूबा हुआ देखा। तब योगधर्म में स्थित हुए भरतभूषण पाण्डव वहाँ से लौटकर पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने की इच्छा से उत्तर दिशा की ओर चल पड़े ॥ 45-46॥   |   mahabharat अध्याय 17.1: वृष्णिवंशियोंका श्राद्ध करके प्रजाजनोंकी अनुमति ले द्रौपदीसहित पाण्डवोंका महाप्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व  »  अध्याय 1: वृष्णिवंशियोंका श्राद्ध करके प्रजाजनोंकी अनुमति ले द्रौपदीसहित पाण्डवोंका महाप्रस्थान  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  17.1.45-46 
तत: पुन: समावृत्ता: पश्चिमां दिशमेव ते।
ददृशुर्द्वारकां चापि सागरेण परिप्लुताम्॥ ४५॥
उदीचीं पुनरावृत्य ययुर्भरतसत्तमा:।
प्रादक्षिण्यं चिकीर्षन्त: पृथिव्या योगधर्मिण:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद वे पश्चिम दिशा की ओर चल पड़े। आगे जाकर उन्होंने द्वारकापुरी को समुद्र में डूबा हुआ देखा। तब योगधर्म में स्थित हुए भरतभूषण पाण्डव वहाँ से लौटकर पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने की इच्छा से उत्तर दिशा की ओर चल पड़े ॥ 45-46॥
 
After this they simply turned towards the west. Going further they saw Dwarkapuri submerged in the ocean. Then Bharatbhushan Pandavas, established in Yogadharma, returned from there and travelled towards the north with the desire to complete the circumambulation of the earth. ॥ 45-46॥
 
इति श्रीमहाभारते महाप्रस्थानिके पर्वणि प्रथमोऽध्याय:॥ १॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत महाप्रस्थानिकपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)