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mahabharat 17.1.16-17: उसके वचन सुनकर नगर और जनपद के लोग अत्यन्त क्षुब्ध हो गए। उन्होंने उसके प्रस्ताव का स्वागत नहीं किया। सबने एक स्वर में राजा से कहा, 'आपको ऐसा नहीं करना चाहिए (आपको हमें छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहिए)'॥16-17॥   |   mahabharat अध्याय 17.1: वृष्णिवंशियोंका श्राद्ध करके प्रजाजनोंकी अनुमति ले द्रौपदीसहित पाण्डवोंका महाप्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  17.1.16-17 
ते श्रुत्वैव वचस्तस्य पौरजानपदा जना:॥ १६॥
भृशमुद्विग्नमनसो नाभ्यनन्दन्त तद्वच:।
नैवं कर्तव्यमिति ते तदोचुस्तं जनाधिपम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उसके वचन सुनकर नगर और जनपद के लोग अत्यन्त क्षुब्ध हो गए। उन्होंने उसके प्रस्ताव का स्वागत नहीं किया। सबने एक स्वर में राजा से कहा, 'आपको ऐसा नहीं करना चाहिए (आपको हमें छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहिए)'॥16-17॥
 
On hearing his words, the people of the city and the district became very agitated. They did not welcome his proposal. All of them said to the king in unison, 'You should not do this (you should not leave us and go anywhere)'॥ 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)