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mahabharat 16.6.15-16h: हे अर्जुन! मेरे पुत्र रूप में अवतरित हुए जगत् के स्वामी गांधारी आदि महर्षियों के शाप को पलटना नहीं चाहते थे; इसलिए उन्होंने इस संकट की सदैव उपेक्षा की ॥15 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 16.6: द्वारकामें अर्जुन और वसुदेवजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 16: मौसल पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  16.6.15-16h 
समुपेक्षितवान् नित्यं स्वयं स मम पुत्रक:।
गान्धार्या वचनं यत् तदृषीणां च परंतप॥ १५॥
तन्नूनमन्यथा कर्तुं नैच्छत् स जगत: प्रभु:।
 
 
अनुवाद
हे अर्जुन! मेरे पुत्र रूप में अवतरित हुए जगत् के स्वामी गांधारी आदि महर्षियों के शाप को पलटना नहीं चाहते थे; इसलिए उन्होंने इस संकट की सदैव उपेक्षा की ॥15 1/2॥
 
O Arjuna! The Lord of the Universe who incarnated in the form of my son did not want to reverse the curse of Gandhari and the great sages; therefore he always ignored this crisis. ॥15 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)