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mahabharat 16.5.8-11: द्वारकापुरी एक नदी के समान थी। वृष्णि और अंधक कुल के लोग उसमें जल के समान थे। घोड़े मछली के समान थे। रथ नावों का काम करते थे। वाद्यों की ध्वनि और रथों की घरघराहट उस नदी के बहते जल की कलकल ध्वनि के समान थी। लोगों के घर तीर्थस्थल और विशाल जलाशय थे। रत्नों का ढेर वहाँ भक्तों के समूह के समान शोभायमान था। वज्र नामक रत्न से बनी हुई चारदीवारी उसकी तटरेखा थी। सड़कें और गलियाँ उसमें जल के झरने और भँवर थीं, चौराहे ठहरे हुए जल वाले तालाबों के समान थे। बलराम और श्रीकृष्ण उसके भीतर दो बड़े मगरमच्छ थे। काल का पाश उसमें मगरमच्छ और घड़ियाल के समान था। बुद्धिमान अर्जुन ने द्वारका जैसी नदी को वृष्णि योद्धाओं से रहित होने के कारण वैतरणी के समान भयानक देखा। वह शीतकाल के कमल के समान शोभा और आनंद से रहित प्रतीत हुई।   |   mahabharat अध्याय 16.5: अर्जुनका द्वारकामें आना और द्वारका तथा श्रीकृष्ण-पत्नियोंकी दशा देखकर दुखी होना   ।   mahabharat पर्व 16: मौसल पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 16: मौसल पर्व  »  अध्याय 5: अर्जुनका द्वारकामें आना और द्वारका तथा श्रीकृष्ण-पत्नियोंकी दशा देखकर दुखी होना  »  श्लोक 8-11
 
 
श्लोक  16.5.8-11 
स तां वृष्ण्यन्धकजलां हयमीनां रथोडुपाम्।
वादित्ररथघोषौघां वेश्मतीर्थमहाह्रदाम्॥ ८॥
रत्नशैवलसंघातां वज्रप्राकारमालिनीम्।
रथ्यास्रोतोजलावर्तां चत्वरस्तिमितह्रदाम्॥ ९॥
रामकृष्णमहाग्राहां द्वारकां सरितं तदा।
कालपाशग्रहां भीमां नदीं वैतरणीमिव॥ १०॥
ददर्श वासविर्धीमान् विहीनां वृष्णिपुङ्गवै:।
गतश्रियं निरानन्दां पद्मिनीं शिशिरे यथा॥ ११॥
 
 
अनुवाद
द्वारकापुरी एक नदी के समान थी। वृष्णि और अंधक कुल के लोग उसमें जल के समान थे। घोड़े मछली के समान थे। रथ नावों का काम करते थे। वाद्यों की ध्वनि और रथों की घरघराहट उस नदी के बहते जल की कलकल ध्वनि के समान थी। लोगों के घर तीर्थस्थल और विशाल जलाशय थे। रत्नों का ढेर वहाँ भक्तों के समूह के समान शोभायमान था। वज्र नामक रत्न से बनी हुई चारदीवारी उसकी तटरेखा थी। सड़कें और गलियाँ उसमें जल के झरने और भँवर थीं, चौराहे ठहरे हुए जल वाले तालाबों के समान थे। बलराम और श्रीकृष्ण उसके भीतर दो बड़े मगरमच्छ थे। काल का पाश उसमें मगरमच्छ और घड़ियाल के समान था। बुद्धिमान अर्जुन ने द्वारका जैसी नदी को वृष्णि योद्धाओं से रहित होने के कारण वैतरणी के समान भयानक देखा। वह शीतकाल के कमल के समान शोभा और आनंद से रहित प्रतीत हुई।
 
Dwarkapuri was like a river. The people of Vrishni and Andhaka clan were like water in it. Horses were like fish. Chariots worked as boats. The sound of musical instruments and the whirring of chariots was like the gurgling sound of the flowing water of that river. People's houses were pilgrimage sites and large water reservoirs. The pile of gems looked beautiful there like a group of devotees. The boundary wall made of a gem called Vajra was its bank line. The roads and lanes were water springs and whirlpools in it, the crossroads were like ponds with stagnant water. Balarama and Shri Krishna were two big crocodiles inside it. The loop of time was like a crocodile and alligator in it. The wise Arjuna saw such a river like Dwarka as terrifying as Vaitarni due to being devoid of Vrishni warriors. It appeared to be devoid of beauty and joy like a lotus of winter. 8-11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)