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mahabharat 16.4.24: अब मैं अपने को अपराधी समझकर मन में अत्यन्त भयभीत हो गया। उसने भगवान् श्रीकृष्ण के दोनों चरण पकड़ लिए। तब महात्मा श्रीकृष्ण ने उसे आश्वासन दिया और पृथ्वी और आकाश में अपना प्रकाश फैलाकर वह ऊपर के लोक (अपने परम धाम) को चला गया॥24॥   |   mahabharat अध्याय 16.4: दारुकका अर्जुनको सूचना देनेके लिये हस्तिनापुर जाना, बभ्रुका देहावसान एवं बलराम और श्रीकृष्णका परमधाम-गमन   ।   mahabharat पर्व 16: मौसल पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 16: मौसल पर्व  »  अध्याय 4: दारुकका अर्जुनको सूचना देनेके लिये हस्तिनापुर जाना, बभ्रुका देहावसान एवं बलराम और श्रीकृष्णका परमधाम-गमन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  16.4.24 
मत्वाऽऽत्मानं त्वपराद्धं स तस्य
पादौ जरा जगृहे शंकितात्मा।
आश्वासयंस्तं महात्मा तदानीं
गच्छन्नूर्ध्वं रोदसी व्याप्य लक्ष्म्या॥ २४॥
 
 
अनुवाद
अब मैं अपने को अपराधी समझकर मन में अत्यन्त भयभीत हो गया। उसने भगवान् श्रीकृष्ण के दोनों चरण पकड़ लिए। तब महात्मा श्रीकृष्ण ने उसे आश्वासन दिया और पृथ्वी और आकाश में अपना प्रकाश फैलाकर वह ऊपर के लोक (अपने परम धाम) को चला गया॥24॥
 
Now I felt very scared in my mind considering myself a criminal. He caught hold of both the feet of Lord Krishna. Then Mahatma Shri Krishna assured him and after spreading his light across the earth and sky, he went to the upper world (to his supreme abode). 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)