श्री महाभारत  »  पर्व 16: मौसल पर्व  »  अध्याय 2: द्वारकामें भयंकर उत्पात देखकर भगवान‍् श्रीकृष्णका यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये आदेश देना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  16.2.12 
विभावसु: प्रज्वलितो वामं विपरिवर्तते।
नीललोहितमञ्जिष्ठा विसृजन्नर्चिष: पृथक्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
अग्निदेव प्रज्वलित होकर अपनी ज्वालाओं को वामावर्त दिशा में घुमाते थे। उनसे नीले, लाल और कभी-कभी मजीठ रंग की अलग-अलग ज्वालाएँ निकलती थीं॥ 12॥
 
Agnidev was lit up and used to rotate his flames in a counter-clockwise direction. From him came separate flames of blue colour, red colour and sometimes of madder colour.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)