श्री महाभारत  »  पर्व 16: मौसल पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरका अपशकुन देखना, यादवोंके विनाशका समाचार सुनना, द्वारकामें ऋषियोंके शापवश साम्बके पेटसे मूसलकी उत्पत्ति तथा मदिराके निषेधकी कठोर आज्ञा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  16.1.3 
प्रत्यगूहुर्महानद्यो दिशो नीहारसंवृता:।
उल्काश्चाङ्गारवर्षिण्य: प्रापतन् गगनाद् भुवि॥ ३॥
 
 
अनुवाद
रेत के भीतर छिपी बड़ी-बड़ी नदियाँ बहने लगीं। चारों दिशाएँ कोहरे से ढक गईं। आकाश से पृथ्वी पर आग बरसाती उल्काएँ गिरने लगीं।
 
Big rivers started flowing hidden inside the sand. All directions were covered with fog. Meteors showering fire on the earth started falling from the sky.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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