श्री महाभारत  »  पर्व 16: मौसल पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरका अपशकुन देखना, यादवोंके विनाशका समाचार सुनना, द्वारकामें ऋषियोंके शापवश साम्बके पेटसे मूसलकी उत्पत्ति तथा मदिराके निषेधकी कठोर आज्ञा  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  16.1.15-16 
वैशम्पायन उवाच
विश्वामित्रं च कण्वं च नारदं च तपोधनम्।
सारणप्रमुखा वीरा ददृशुर्द्वारकां गतान्॥ १५॥
ते तान् साम्बं पुरस्कृत्यभूषयित्वास्त्रियं यथा।
अब्रुवन्नुपसंगम्य दैवदण्डनिपीडिता:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी बोले - "एक समय महर्षि विश्वामित्र, कण्व और तपस्वी ऋषि नारदजी द्वारका में गये हुए थे। उस समय देवताओं द्वारा मारे गये सारण आदि वीर योद्धा स्त्री वेश में सुशोभित साम्ब को अपने पास ले आये। उन सबने उन ऋषियों को देखकर उनसे इस प्रकार पूछा - ॥15-16॥
 
Vaishampayana said, "Once upon a time, Maharishi Vishwamitra, Kanva and Narada, the sage of penance, had gone to Dwarka. At that time, the brave warriors like Saran etc., who were smitten by the gods, took Samba to them, adorned in the guise of a woman. All of them saw those sages and asked them thus: ॥15-16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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