Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 15.8.18-19: अब आप भी मुझे वन जाने की अनुमति दीजिए। इस विषय में आपको अन्य कोई विचार नहीं करना चाहिए। आप लोगों का हमारे साथ जो प्रेमपूर्ण सम्बन्ध अनादि काल से है, मेरा विश्वास है कि अन्य देशों के राजाओं और उनकी प्रजा के बीच ऐसा सम्बन्ध नहीं होगा॥ 18-19॥ | mahabharat अध्याय 15.8: धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना । mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
भवन्तोऽप्यनुजानन्तु मा च वोऽभूद् विचारणा॥ १८॥
अस्माकं भवतां चैव येयं प्रीतिर्हि शाश्वती।
न च सान्येषु देशेषु राज्ञामिति मतिर्मम॥ १९॥
अनुवाद
अब आप भी मुझे वन जाने की अनुमति दीजिए। इस विषय में आपको अन्य कोई विचार नहीं करना चाहिए। आप लोगों का हमारे साथ जो प्रेमपूर्ण सम्बन्ध अनादि काल से है, मेरा विश्वास है कि अन्य देशों के राजाओं और उनकी प्रजा के बीच ऐसा सम्बन्ध नहीं होगा॥ 18-19॥
‘Now you too please give me permission to go to the forest. You should not have any other thoughts about this. The loving relationship that you people have with us since forever, I believe that such a relationship will not be there between the kings of other countries and their subjects.॥ 18-19॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥