Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 15.7.2: कुरु नंदन! अपनी द्वैत स्थिति और शक्तियों पर अच्छी तरह विचार करके ही शत्रु से युद्ध करना या संधि करना उचित है। यदि शत्रु दृढ़ निश्चयी हो और उसके सैनिक स्वस्थ एवं संतुष्ट हों, तो उस पर अचानक आक्रमण करने के स्थान पर उसे परास्त करने का कोई अन्य उपाय सोचो।॥ 2॥ | mahabharat अध्याय 15.7: युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके द्वारा राजनीतिका उपदेश । mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
कौरव्य पर्युपासीथा: स्थित्वा द्वैविध्यमात्मन:।
तुष्टपुष्टबल: शत्रुरात्मवानिति च स्मरेत्॥ २॥
अनुवाद
कुरु नंदन! अपनी द्वैत स्थिति और शक्तियों पर अच्छी तरह विचार करके ही शत्रु से युद्ध करना या संधि करना उचित है। यदि शत्रु दृढ़ निश्चयी हो और उसके सैनिक स्वस्थ एवं संतुष्ट हों, तो उस पर अचानक आक्रमण करने के स्थान पर उसे परास्त करने का कोई अन्य उपाय सोचो।॥ 2॥
Kuru Nandan! It is appropriate to fight or make peace with the enemy after considering one's dual situation and strengths well. If the enemy is strong-willed and his soldiers are healthy and satisfied, then instead of attacking him suddenly, think of some other way to defeat him.॥ 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥