Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 15.5.36-37h: 'तात! यह देखा जा सकता है कि कर्मों का क्रम चक्र की भाँति निरन्तर चलता रहता है। महाराज! आपको नाना प्रकार के कोषों के संचय के लिए सदैव विवेकपूर्ण प्रयत्न करना चाहिए। इसके विपरीत, अन्यायपूर्ण प्रयत्नों का त्याग कर देना चाहिए। 36 1/2॥ | mahabharat अध्याय 15.5: धृतराष्ट्रके द्वारा युधिष्ठिरको राजनीतिका उपदेश । mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
'तात! यह देखा जा सकता है कि कर्मों का क्रम चक्र की भाँति निरन्तर चलता रहता है। महाराज! आपको नाना प्रकार के कोषों के संचय के लिए सदैव विवेकपूर्ण प्रयत्न करना चाहिए। इसके विपरीत, अन्यायपूर्ण प्रयत्नों का त्याग कर देना चाहिए। 36 1/2॥
‘Tat! It can be seen that the sequence of tasks always continues like a wheel. Maharaj! You should always make judicious efforts to accumulate various types of treasures. On the contrary, unjust efforts should be abandoned. 36 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥