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mahabharat 15.38.8: धिक्कार है हमारे इस राज्य को, धिक्कार है हमारे बल और पराक्रम को और धिक्कार है इस क्षत्रिय धर्म को भी! जिसके कारण आज हम मृतकों के समान जीवन जी रहे हैं।   |   mahabharat अध्याय 15.38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  15.38.8 
धिग् राज्यमिदमस्माकं धिग् बलं धिक् पराक्रमम्।
क्षत्रधर्मं च धिग् यस्मान्मृता जीवामहे वयम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
धिक्कार है हमारे इस राज्य को, धिक्कार है हमारे बल और पराक्रम को और धिक्कार है इस क्षत्रिय धर्म को भी! जिसके कारण आज हम मृतकों के समान जीवन जी रहे हैं।
 
Shame on this kingdom of ours, shame on our strength and valour and shame on this Kshatriya Dharma too! Because of which today we are leading a life like that of the dead.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)