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mahabharat 15.38.6: मैं पुत्रहीन तथा यशस्वी गांधारी के लिए उतना दुःखी नहीं हूँ, क्योंकि उसने अपने पतिव्रता धर्म का पालन किया और इसीलिए वह पतिलोक चली गई।   |   mahabharat अध्याय 15.38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  15.38.6 
न च शोचामि गान्धारीं हतपुत्रां यशस्विनीम्।
पतिलोकमनुप्राप्तां तथा भर्तृव्रते स्थिताम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
मैं पुत्रहीन तथा यशस्वी गांधारी के लिए उतना दुःखी नहीं हूँ, क्योंकि उसने अपने पतिव्रता धर्म का पालन किया और इसीलिए वह पतिलोक चली गई।
 
I am not as sad for the sonless and famous Gandhari, because she followed the duty of being faithful to her husband and hence has gone to her husband's world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)