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mahabharat 15.38.2: हे ब्रह्मन्! मेरा विचार है कि मनुष्यों के भाग्य को ठीक-ठीक जानना बहुत कठिन है, जबकि विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र को इस प्रकार वन की आग में जलकर मरना पड़ा।   |   mahabharat अध्याय 15.38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 38: नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  15.38.2 
दुर्विज्ञेया गतिर्ब्रह्मन् पुरुषाणां मतिर्मम।
यत्र वैचित्रवीर्योऽसौ दग्ध एवं वनाग्निना॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! मेरा विचार है कि मनुष्यों के भाग्य को ठीक-ठीक जानना बहुत कठिन है, जबकि विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र को इस प्रकार वन की आग में जलकर मरना पड़ा।
 
O Brahman! I am of the view that it is very difficult to know the fate of human beings with accuracy, when Vichitravirya's son Dhritarashtra had to die in this manner by being burnt in a forest fire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)